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कर्म बडा या भाग्य

कई लोग भाग्य के भरोसे बैठे रहते हैं, पर अंत में उन्हें कुछ खास नहीं मिलता। असल में भाग्य आपका पेट भर दे, ऐसा कभी नहीं होता। असल में भाग्य आटा देता है, रोटी नहीं। इसी संदर्भ में एक कहानी है। एक ब्राह्मण के घर जुड़वां संताने हुईं। दोनों का लालन-पालन एक जैसा हुआ। पर बड़ा होकर एक बेटा राज पुरोहित बना और दूसरा बेटा निर्धन ही रह गया। साधारण दृष्टि से इसे भाग्य का दोष मान लिया जाएगा। लेकिन असल में यह दोष भाग्य का नहीं, कर्म का माना जाएगा। दोनों को ही समाज में सम्मान मिला है, पर उसके स्वरूप अलग-अलग हैं। इसलिए शास्त्रों में भी हमेशा कर्म के बल पर सौभाग्य पाने की बात कही जाती है। अगर व्यक्ति सही दिशा में लगातार प्रयास करे, तो वह अपने भाग्य को बलवान बनाकर मुंहमांगा सुख पा सकता है। पर अगर भाग्य के भरोसे बैठा रहा जाए, तो शायद ही सौभाग्य मिलता है।

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