नवरात्रि में घट स्थापना का समय

इस बार नवरात्रि मे घट स्थापना सुबह 8.05 बजे...

अप्सरा और यक्षिणी वशीकरण कवच

इस कवच के जप से समस्त प्रकार की सिद्धियाँ देने वाली यक्षिणी साधक के नियंत्रण मे...

Urvashi Apsara Sadhana

इस प्रकार की साधना जीवन में करना साधक का सौभाग्य ही होता हैं इसलिए प्रयास करके इस प्रकार की साधना जीवन मे जरुर करनी चाहिए क्योंकि....

Tilottama Apsara Sadhana Procudure

तिलोत्तमा अप्सरा की गिनती भी श्रेष्ठ अप्सराओं मे होती हैं। यह अप्सरा प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनो ही रुप मे साधक की सहायता करती रहती हैं ....

Celestial Nymph Rambha Apsara (रम्भा अप्सरा साधना)

रम्भा अप्सरा साधना की सिद्धि प्राप्त करने पर, रम्भा उसके जीवन में हर कदम पर एक छाया के रूप में और साक्षात रुप मे ....

Menka Rambha with Urvashi Apsara Sadahna

इस साधना को समपन्न करने पर आठ अप्सराएँ एक साथ दर्शन देती हैं इस प्रकार की साधना जगत मे बहुत साधनाएँ...

Rambha Apsara Sadahna

Urvashi is considered one of the best in the Nymphs. Rambha is also an amazing, talented and skilled dancer but...

Navratri April 2016



कल शुक्रवार (8 अप्रैल) से चैत्र नवरात्रि की शुरुआत होगी, जिसके आठ दिन अनुष्ठान में आदि शक्ति दुर्गा के नौ रुपों की पूजा की जाएगी। देवी आराधना का यह पर्व 15 अप्रैल, शनिवार को समाप्त होगा।

आइए जानते हैं, आठ अप्रैल को इस पूजा के लिए कलश स्थापना या घट-स्थापना का मुहुर्त क्या है और इन नौ दिनों देवी दुर्गा के भक्त उनके किन-किन रूपों की पूजा करते हैं।

 
चैत्र नवरात्रि घट-स्थापना मुहूर्त

पंचांग के अनुसार इस साल चैत्र नवरात्रि की कलश स्थापना मुहूर्त 11:57 से 12:48 बजे शुभ माना गया है। यह केवल 50 मिनट्स की होगी। ध्यातव्य है कि कलश स्थापना मुहूर्त प्रतिपदा तिथि के अभिजीत मुहूर्त के दौरान निर्धारित है।

 
भारतीय समयानुसार, प्रतिपदा तिथि का प्रारम्भ 7 को अप्रैल, 2016 को 16:53 बजे से होगा और इस तिथि की समाप्ति 8 अप्रैल, 2016 को 13:05 बजे होगा।

नवरात्रि का पहला दिन : 8 अप्रैल 2016 (शुक्रवार)
घट-स्थापना के साथ नवरात्र आरम्भ, शैलपुत्री पूजा

नवरात्रि दूसरा दिन: 9 अप्रैल 2016 (शनिवार)
ब्रह्मचारिणी पूजा, चंद्रघंटा पूजा

नवरात्रि तीसरा दिन: 10 अप्रैल 2016 (रविवार)
कुष्मांडा पूजा

नवरात्रि चौथा दिन: 11 अप्रैल 2016 (सोमवार)
स्कंदमाता पूजा

नवरात्रि पांचवां दिन: 12 अप्रैल 2016 (मंगलवार)
कात्यायनी पूजा

नवरात्रि छठा दिन: 13 अप्रैल 2016 (बुधवार)
कालरात्रि पूजा

नवरात्रि सातवां दिन: 14 अप्रैल 2016 (गुरुवार)
महागौरी पूजा, दुर्गा महा अष्टमी पूजा, सरस्वती पूजा

नवरात्रि आठवां दिन: 15 अप्रैल 2016 (शुक्रवार)
राम नवमी, चैत्र नवरात्रि समाप्त।



चन्द्र ग्रहण मार्च 2016



यह चन्द्र ग्रहण और इसके बाद होने वाले सभी ग्रहण बहुत ही महत्त्वपुर्ण हैं। यह सभी ग्रहण सभी की कुंडली और जीवन को हिलाने वाले हैं। कारण बाद में सपष्ट करुंगा। अभी के लिए इतना ही कहना चाहता हूँ यदि किसी को साधना सिद्ध करनी हैं तो यह उत्तम समय हैं लेकिन साधनाए नियत से सिद्द होती हैं। अधिक जानकारी आपको समय से दी जाएगी।

होलाष्टक क्या होता हैं?



होलाष्टक में शुभ कार्यों का प्रारंभ नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से कष्ट और पीड़ाओं की आशंका घेरती है और संबंधों में खटास भी आ सकती है। इस तरह की परेशानियों से बचने के लिए इन दिनों में शुभ कार्यों का निषेध किया गया है।

फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से लेकर होलिका दहन तक की अवधि को शास्त्रों में होलाष्टक कहा गया है। अर्थात होली से पहले के आठ दिन। होलाष्टक होली के रंगारंग पर्व के आगमन की सूचना देता है। होलाष्टक में किसी भी शुभ कार्य का निषेध माना गया है। इन दिनों को किसी भी संस्कार को संपन्न करने के लिए शुभ नहीं माना गया है।

धर्म में आस्था रखने वाले इन दिनों में किसी भी शुभ कार्य के आयोजन से दूरी रखते हैं। गृहप्रवेश, विवाह और गर्भाधान संस्कार जैसे महत्वपूर्ण संस्कार इस अवधि में बिल्कुल संपन्न नहीं किए जाते हैं। लोग नए कार्य के शुभारंभ का ख्याल भी स्थगित कर देते हैं। होलाष्टक की यह परंपरा उत्तर भारत में अधिक निभाई जाती है और दक्षिण भारत में यह कम ही देखने को मिलती है। होलाष्टक के आठ दिनों में शुभ कार्यों की वर्जना के ज्योतिष और पौराणिक दोनों ही कारण माने गए हैं।

एक मान्यता है कि कामदेव ने भगवान शिव का तप भंग किया था और कामदेव की इस चेष्टा से रुष्ट होकर भगवान शिव ने फाल्गुन की अष्टमी तिथि के दिन ही उसे भस्म कर दिया था। कामदेव की पत्नी रति ने शिव जी की आराधना की और अपने पति कामदेव को पुनर्जीवन का आशीर्वाद पाया। महादेव से रति को मिलने वाले इस आशीर्वाद के बाद ही होलाष्टक का अंत धुलेंडी को हुआ। चूंकि होली से पूर्व के आठ दिन रति ने कामदेव के विरह में काटे इसलिए इन दिनों में शुभ कार्यों से दूरी रखी जाती है।

कामदेव के इस प्रसंग के कारण ही होलाष्टक में शुभ कार्य वर्जित हैं। ऐसा भी माना जाता हैं कि होली के पहले के आठ दिनों में प्रह्लाद को काफी यातनाएं दी गई थीं। प्रह्लाद को मिलने वाली यातनाओं से भरे इन आठ दिनों को अशुभ मानने की परंपरा ही चल पड़ी है।

होलाष्टक में शुभ कार्यों के निषेध का ज्योतिष कारण भी तर्कसंगत है। ज्योतिष के अनुसार अष्टमी को चंद्रमा, नवमी तिथि को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र और द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चतुर्दशी को मंगल तथा पूर्णिमा को राहु उग्र स्वभाव के हो जाते हैं।

इन ग्रहों के निर्बल होने से मनुष्य की निर्णय क्षमता क्षीण हो जाती है और इस कारण मनुष्य अपने स्वभाव के विपरीत फैसले कर लेता है। ऐसा न हो इसी कारण इन आठ दिनों में उसे किसी भी तरह के शुभ कार्य का फैसला लेने से मना किया गया है। इन आठ दिनों में मन की स्थिति अवसादग्रस्त रहती है और इसीलिए उसे अवसाद से उबारने के लिए इन आठ में रंगों की आमद हो जाती है। उसके मन में उल्लास लाने और वातावरण को जीवंत बनाने के लिए रंगों का प्रयोग विभिन्न तरीकों से किया जाता है।

होलाष्टक के पहले दिन जिस जगह होली का पूजन किया जाना है वहां गोबर से लिपाई की जाती है और उस जगह को गंगाजल से पवित्र किया जाता है। होलाष्टक में होली की तमाम तैयारियां अंतिम रूप लेती हैं और लोग उत्साह के साथ होली के त्योहार की प्रतीक्षा करते हैं। कुछ स्थानों पर तो होलाष्टक के आठ दिनों में होली मनाई जाती है या होली के रंग किसी न किसी रूप में बिखरने लगते हैं।

ये आठ दिन अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग परंपराओं में गूंथ दिए गए हैं और ज्यादातर इन दिनों में अधिक सक्रियता से सिद्धि प्राप्ति के लिए श्रेष्ठ समय होलाष्टक के आठ दिनों को व्रत, पूजन और हवन की दृष्टि से अच्छा समय माना गया है।

माना गया है कि जो भी यजमान इन दिनों में हवन कार्य संपन्ना कराते हैं उन्हें पुण्य की प्राप्ति होती है। किसी भी तरह की सिद्धि प्राप्त करने के लिए भी ये दिन श्रेष्ठ हैं। आत्मबल प्राप्त करने की दृष्टि से ये सर्वोत्तम समय है। इस समय भगवान की भक्ति में ध्यान लगाना सबसे उपयुक्त है और इस तरह उनकी कृपा प्राप्त की जा सकती है।

दान के लिए श्रेष्ठ समय: होलाष्टक के दिन दान करने की दृष्टि से भी शुभ दिन हैं। इन दिनों हमें अधिक उदारता के साथ कपड़े, अनाज, धन और यथासंभव दान करना चाहिए। अपनी हैसियत के मुताबिक इन दिनों में दान करने से भगवान की कृपा प्राप्त होती है और जीवन के कष्टों का निवारण होता है।